Friday, 5 October 2018

देह धरे को दंड’: हाशिये पर धकेल दी गई अस्मिताओं का एक मुखर स्वर



सुनील यादव

आज जब स्त्री विमर्श को स्त्री यौनिकता तक सीमित करने की मुहिम जोरों पर हो, तथाकथित स्त्रीवादी आंदोलन से बहुजन स्त्री के सरोकार कट से गए हों, स्त्री सुचिता एवं नैतिकता की बहस सेमीनारों और गोष्ठियों तक सिमट रही हो । अस्मितावादी आंदोलनो को खत्म करने की राजनीतिक साजिसे अपने नए हथकंडे अख़्तियार कर रही हो, आरक्षण के नाम पर तमाम प्रवाद फैलाए जा रहे हो, जब बहुत से प्रगतिशील बुद्धिजीवी भी आरक्षण के मुद्दे पर चुप्पी साध लेते हों । जब हाशिये के समाज की लोकतंत्र तथा साहित्य में भागीदारी के लिए जद्दोजहद जारी हो । ऐसे में प्रीति चौधरी का लेखन खासा महत्व रखता है । वे अपनी सबाल्टर्न दृष्टि से इस हाशिये के समाज की समुचित भागीदारी का एक स्पेस तलाश करती हुई प्रतीत होतीं हैं।  उनकी किताब ‘देह धरे को दंड’ आधी दुनिया उसमें भी विशेषकर बहुजन स्त्री के सवालों को पूरे सामाजिक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने  और परखने का नया नजरिया तो देती ही है साथ ही समाज के जनतांत्रिकरण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करती हैं ।   
सिमोन की विख्यात किताब ‘द सेकेंड सेक्स’ का अनुवाद करते हुए उसकी भूमिका में प्रभा खेतान ने लिखा था कि “हममें से बहुतों ने पश्चिमी शिक्षा पाई है, पश्चिमी पुस्तकों का गहरा अध्ययन किया है, पर सारी पढ़ाई के बाद मैंने यही अनुभव किया कि भारतीय औरत कि परिस्थिति 1980 के आधुनिक पश्चिमी मूल्यों से नहीं आंकी जा सकती।” यहाँ भारतीय समाज में स्त्री की दशा का अध्ययन करके उनके मूल्यांकन के जिस सैद्धान्तिक आधार की बात प्रभा खेतान कर रहीं थीं, उस सैद्धांतिक आधार पर ही प्रीति चौधरी का पूरा चिंतन प्रौढ़ होता है। प्रीति चौधरी भारतीय स्त्री की समस्याओं पर बात रखने के लिए जो टूल्स इस्तेमाल करती हैं ये टूल्स पाश्चात्य चिंतन से आयातित न होकर भारतीय समाज के गहराई से अध्ययन के उपरांत सृजित किए गए हैं। इसीलिए उनका चिंतन अत्यंत प्रमाणिक नजर आता है।
 प्रीति चौधरी अपने जीवन के अनुभवो को अपने चिंतन में एक हथियार के तौर पर प्रयोग करती हैं, इसीलिए उनका भोजपुरिया समाज में स्त्री संबंधी चिंतन खासा महत्व का है, वे इस समाज परलिखते हुए लिखती हैं कि “क्या यह विडम्बना नहीं है कि पत्नी का ध्यान रखने वाले पुरुष हमारे गाँव समाज परिवेश में कमतर पुरुष (मौगा) आँके जाते हैं । असली मर्द तो रात के अंधेरे में आता है । पत्नी पर वर्चस्व स्थापित करता है और चलता बनता  है।” 
प्रभा खेतान की किताब ‘बाजार के बीच: बाजार के खिलाफ’ के बहाने प्रीति चौधरी ने भूमंडलीकरण के दौर में यौनिकता एवं वस्तुकरण में तब्दील होती स्त्री जैसे महत्पूर्ण सवाल उठते हुए लिखती हैं कि “भूमंडलीकरण के इस दौर में पितृसत्तात्मक व्यवस्था को सरंक्षण प्राप्त है. इस व्यवस्था को चुनौती देने वाले नारी समूह कम ही हैं, सवाल ये है कि पढ़ी लिखी दुनिया के साथ कदम मिलाती सशक्त स्त्री, स्थानीय स्तर पर दलित वंचित महिलाओं के साथ स्वयं को जोड़ पाएगी ?बाजार की मार झेलती दलित स्त्री की चीख क्या वह सुन रही है ?”
अगर एक तरफ इतिहास के साथ मिथकों का  स्त्रीवादी पाठ प्रस्तुत करते हुए  प्रीति जी अपने लेख ‘नकली दुनिया के किस्से’ में इलेक्ट्रानिक मीडिया में गढ़ी जा रही स्त्री छवि का क्रिटिक रचती हैं तो दूसरी तरफ “प्रेम को बख्शिये” लेख मे प्रेम के संदर्भ में देश का तालिबानीकरण करने पर आमादा तथाकथित समाज नियंताओं को कटघरे में खड़ी करती हैं. प्रेम जैसे विषय पर जब रोज सैकड़ो पृष्ठ खर्च किए जा रहे हों ऐसे में प्रीति चौधरी के लेख  “जरुरत है रोम रोम में महसूसने की” का अपना ख़ास महत्व है, उन्होंने इस लेख में कामुकता और प्रेम का जो फर्क किया है, वह अद्भुत है वे लिखती हैं कि “किसी नियामक बिंदु पर खुद को निर्वासित कर देना ही प्रेम की पवित्रता में आस्था और मनुष्यता में विश्वास जगाता है. प्रेम और वासना का फर्क यहीं से शुरू होता है ”।
      इस पुस्तक का दूसरा खंड जो ‘हाशिये का विमर्श’ नाम से है, हाशिये के समाज  के विविध पहलुओं पर विस्तार से बात करता है। इस खंड का विस्तार आरक्षण से लेकर राजनीति तथा लोकतन्त्र के विविध आयामों तक है । भारतीय राजनीति के संदर्भ में बात करते हुए अक्सर यह जुमला उछाला जाता है कि भारतीय राजनीति जातिवादी हो गयी है . यह जुमला नारा के रूप में तब उछाला जाने लगा जब दलित एक पिछड़ी जातियां राजनीति में भागीदारी करते हुए सत्ता तक पहुंची..  प्रख्यात राजनीतिक चिन्तक रजनी कोठारी ने राजनीति में जातिवाद जैसे जुमले का क्रिटिक पेश करते हुए जातियों के राजनीतिकरण का सिद्धांत प्रस्तुत किया, उन्होंने लिखा “जिस समाज में जातिगत सरंचनाओं के माध्यम से संगठन और गोलबंदी की सुविधा हो और जिस समाज में अधिकांश जनगण जातियों के रूप में ही संगठित हों, वहां राजनीति जाति आधारित गोलबंदी की कोशिश करेगी ही. इस विश्लेषण से साफ हो जाना चाहिए कि ‘राजनीति में जातिवाद’ की कथित परिघटना असल में ‘जाति का राजनीतिकरण’ ही है.” रजनी कोठारी के इस सिद्धांत के आलोक में प्रीति चौधरी लिखती हैं कि “आज स्वतंत्रता के साथ वर्षों बाद हमें राजनीतिक के स्वरूप और चरित्र में बहुत बदलाव नजर आते हैं, जैसे अस्मितावादी व पहचान की राजनीति का मुख्य भूमिका में आ जाना. मझली एवं छोटी जातियों का उभार भारतीय लोकतंत्र के लिए एक स्वाभाविक किन्तु बेहद अहम् मोड़ है .” । इसी क्रम में प्रीति चौधरी मंडल कमीशन की सिफारिसें तथा आरक्षण विरोधियों के कुतर्को का सटीक विश्लेषण करती हैं . दुनिया भर में स्त्री मुक्ति आंदोलन को ब्लैक एंड वाईट में बंटते हुए हम देख सकते हैं . जाति विमर्श को आगे बढ़ाते हुए प्रीति चौधरी उसे जेंडर की बहस तक ले आती हैं “यहाँ भारत की विडंबना है कि चाहे वह वामपंथी आंदोलन हो या स्त्रीवादी आंदोलन जाति के सवाल से जूझे बिना वे एकांगी और अधूरे हैं . भारत में इतनी व्यापक गरीबी के बावजूद यदि वामपंथी अपनी व्यापक पैठ न बना सके तो इसकी वजह यही थी कि उन्होंने वर्ग की अवधारणा पर जरुरत से ज्यादा भरोसा कर जाति को किनारे रखा। ”
      ‘समान प्रतिस्पर्धा के भोथरे तर्क’, ‘खैरात नहीं सामजिक न्याय का तकाजा है आरक्षण’ नामक इस किताब के दो लेख आरक्षण के विविध पहलुओं पर गहराई से विचार करते हैं. इसी क्रम में प्रीति चौधरी अकादमिक दुनिया में सवर्णों के वर्चस्व और न्युक्तियों में भाई भतीजावाद के कारण यू जी से नेट जैसी परीक्षाओं की भूमिका की एक सार्थक पड़ताल पेश करती हैं . आज स्थिति और भी भयावह है नेट, पीएच. डी. और आपकी योग्यता से ज्यादा मायने आपकी जाति और आपके संबंध रखते हैं “भारत में सबसे बड़ी पहचान जाति है, जिसे योग्यता का पर्याय मान लिया गया है. साक्षात्कार बोर्डों में जाति विशेष का होना अपने आप में एक सोर्स मान लिया जाता है ....द्रोणाचार्यों की परम्परा खत्म नहीं हुई है अब भी एकलव्यों के सामने अर्जुन खड़े मिलते हैं .” हजारों सालों से एक वर्ग विशेष को शिक्षा से दूर रखा गया उसके ज्ञान के सभी श्रोतो को ब्लाक कर दिया गया. ऐसे में समान प्रतिस्पर्धा के तर्क सचमुच भोथरे ही हैं, आरक्षण के प्रावधान पर बात करते हुए यह मान लिया जाता है कि यह नौकरी दिलाने का साधन है जबकि आरक्षण समाज में समुचित भागीदारी के हथियार के रूप में आया था ।
      शिक्षा में भाषा के सवाल जैसे बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे के साथ इस पुस्तक में कमलाकांत झा की पुस्तक ‘पाठ्यपुस्तकों की राजनीति’  के बहाने पाठ्यपुस्तकों की राजनीति पर प्रीति जी विस्तार से बात करती हैं । ‘नयी नहीं है भारतीयों के साथ बदसलूकी’ लेख में अगर वे अमेरिका की दादागिरी तथा उसकी ‘शक्ति की राजनीति’ की पड़ताल करती हैं तो ‘सरबजीत के बहाने कुछ सवाल’ में  सरबजीत मामले पर बौराई हुई प्रतिक्रियाओं और विवेकहीन वक्तव्यों की आलोचना करती हैं ।
      इस किताब में प्रीति चौधरी ने मुसलमानों की मूलभूत समस्याओं पर बहुत गहराई से लिखा है है । जैसा की हम जानते हैं मुस्लिम समाज गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, भुखमरी,अंधविश्वास, सांप्रदायिकता इत्यादि समस्याओं से जूझ रहा है । शिक्षा में वृद्धि दर काफी धीमी है । सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व लगातार बढ़ रहा है पर यह विकास दर बहुत कम तथा चिंता जनक है । मुस्लिम समाज में स्त्री-पुरुष लिंगानुपात राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संस्थान (NSSO) के 66वें(2009-10) चक्र के आंकड़ों के अनुसार “गाँवों में 1000 पुरुषों पर 921 महिलाएँ तथा शहरों में यह अनुपात 1000 पुरुषों पर 923 महिलाएँ हैं ।  जबकि सम्पूर्ण भारत के  स्त्री पुरुष का यह अनुपात 1000 पुरुषों पर गाँवों में 947  तथा शहरों में 909 महिलाएँ हैं ।”  शिक्षा, स्वास्थ्य,रोजगार स्वतंत्रता  सभी दृष्टिकोण से मुस्लिम महिलाएँ  देश की सर्वाधिक पिछड़ी हुई महिलाएँ मानी जाएंगी । पर्दा प्रथा, तीन तलाक,बाल विवाह, बहुविवाह इत्यादि चीजों ने  मुस्लिम महिलाओं का जीवन दूभर कर दिया है । एक तरफ जहाँ वे गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा की मार से त्रस्त हैं वहीं धार्मिक क़ानूनों की मनमानी व्याख्या स्त्री विरोधी साबित हो रही है ।अगर भारतीय मुसलमान शिक्षा के क्षेत्र में देश के अन्य समुदायों से पीछे हैं ।  इस समुदाय में बड़े पैमाने पर फैली गरीबी और बेरोजगारी इसके लिए जिम्मेदार है ।  मुस्लिम समुदाय की वे बिरादरियाँ जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक है, वे शिक्षा के मामले में भी आगे हैं ।  आधुनिक सोच और शिक्षा से वंचित मुस्लिम समाज का एक बड़ा तबका मुल्ला मौलवियों के प्रभाव से ग्रस्त जीवन के हर क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है ।  सच्चर कमेटी रिपोर्ट भी बताती है कि “भारतीय मुसलमान शिक्षा के मामले में लगभग हर स्तर पर पिछड़े हैं । उनकी साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है ।  मुस्लिम समाज के इन सब समस्याओं को अपने जीवन के व्यापक अनुभवो के माध्यम से प्रीति चौधरी अपने लेख ‘दर्द- ए- मुसलमान’ में अभिव्यक्त करती हैं । वो बिलकुल सच कहती हैं कि अगर भारतीय मुसलमान के दर्द को महसूस करना है तो राही मासूम रज़ा, शानी, मंजूर एहतेशाम और अब्दुल बिस्मिल्लाह के उपन्यासों में तलस करिए , कुछ फिल्म के नायकों कि चमकती तस्वीरे भारतीय मुसलमान कि वास्तविक आईना नहीं हैं ।  
      आज के इस अस्मितावादी विमर्श के दौर में अगर अस्मितावादी आंदोलनो के भटकाव को जानना है, उनके संघर्षों को सही मायने में समझना है तो ‘देह धरे को दंड’ का बार बार पढ़ा जाना जरूरी है ।

पुस्तक- देह धरे को दंड – प्रीति चौधरी, साहित्य भंडार, इलाहाबाद  
 

Friday, 28 September 2018

लोहिया और आज का भैया मार्का समाजवाद


आज मैं लोहिया रचनावली खंड 3 के एक बेहद चर्चित लेख ‘सत्ता पाने की योजनाबद्ध इच्छा शक्ति’ पर विस्तार से बात करूँगा. अपने इस लेख में अपनी तरफ से कुछ नहीं लिखुँगा बल्कि जो लोहिया ने कहा है उसे ही व्याख्यायित करुंगा. लोहिया ने अपने इस लेख में समाजवादियों के सत्ता पाने के रास्तें क्या हों? इस पर बहुत विस्तार व् सावधानी से लिखा है.
1-      लोहिया ने भारतीय राजनीति के पांच ठोस सिद्धान्त बताए -समाजवाद, समता, विकेंद्रीकरण, अहिंसा और जनतंत्र . इसके बाद लोहिया प्रशिक्षण की बात करते हुए प्रशिक्षण के लिए तीन गुण बतातें हैं – साहस, शील और निपुणता .  इन तीन गुणों में वे साहस को सबसे ऊपर रखते हैं . साहस के संदर्भ में वे लिखते हैं कि ‘साहस गुण को परिष्कृत करने और बढाने के लिए 7 वर्ष की अवधि में समाजवादी दल के समिति सदस्यों को साल में 2 महीने जेल में बिताने चाहिए और काउंसलरों को न्याय के लिए और गरीबी के खिलाफ जनांदोलन में कम से कम एक बार भाग लेना चाहिए ......देश  में इतनी गरीबी है और इतने अन्याय होते रहते हैं कि जब तक उनके लिए जिम्मेदार समाज और सरकार न बदले, तब तक साहसी लोग वर्ष के बारहों महीने जेल में काट सकते हैं . इस बात का ख्याल रखते हुए कि 2 महीने  जेल काटना कोई विलक्षण साहस का काम नहीं है बल्कि साधारण और बहुत ही साधारण कर्तव्य है.’ अब इस दौर के समाजवाद का झंडा उठाने वाले लोहिया के दावेदारों में क्या ये ‘साहस’ बचा रह गया है ? क्या जनता की समस्याएँ ख़त्म हो चुकी हैं? क्या गरीबी ख़त्म हो चुकी है ? क्या देश में सबकुछ ठीक चल रहा है ?  देश में घटित होने वाले तमाम जन मुद्दों पर आपकी घनघोर चुप्पी क्यों है ?

2-      लोहिया कहते हैं कि ‘सत्ता पाने की समाजवाद की इच्छा अब काले बादलों में ढकी नहीं रहनी चाहिए ....आगामी 7 वर्ष को मैं तैयारी के वर्ष के रूप में देखता हूँ . इस अवधि में पार्टी को 3 हजार पदाधिकारी, 30 हजार समिति सदस्य 3 लाख काउंसलर और 30 लाख सदस्यों को प्रशिक्षित कर लेना चाहिए. इसी प्रशिक्षण से विभिन्न  विधानसभा सभाओं और लोकसभा के लिए 3 हजार विधायक तैयार किए जाएंगे जो राज्य और केंद्र की सरकारों के प्रभावकारी और क्रन्तिकारी ढंग से चला सकेंगे’’ ....इस लेख की यह पहली बात है अब इसके आलोक में आज के लोहिया के विरासत का दावा करने वाले समाजवादियों को परखें तो वो जीरो से भी निचे ठहरते हैं. इस पार्टी में कभी प्रशिक्षण शिविर आयोजित ही नहीं होता . एक अराजक भीड़ सत्ता के साथ इस पार्टी में आती है और झक्क सफ़ेद कपड़ों में अपने नेता के लिए जवानी कुर्बान गैंग में तब्दील हो जाती है. विचार शून्यता इस कदर है कि  युवाओं की नई पौध कुछ ज्यादा हिन्दू और मुसलमान हो गयी है। दक्षिण पंथी उग्र संगठनों और पार्टियों ने सपा के युवा कैडर के एक हिस्से को अपने वैचारिकी की तरह का हिन्दू बना दिया है। आर्थिक रूप से सम्पन्न हुए पिछड़े वर्ग के युवाओं में यह नशा तेजी से उभरा है। ये वही युवा हैं जो भगवा ओढ़ कर मंदिरों में घण्टा बजाते हैं, भगवत कथा का पाठ या महीनों तक कीर्तन करते करवाते हैं। ये आज का वह पाखंडी युवा है जिसके सभी अंगुलियों में कोई कष्ट हरण अंगूठी, कलाई में कलेवा बंधा दिखेगा। इनकी वैचारिक शून्यता ने इन्हें घनघोर पाखंडी बना दिया है। ये धर्म का अर्थ भी नही जानते। धर्म का अर्थ धारण करना होता है ढोंग करना नही। आप सब अपने धर्म को मानों किसे समस्या है पर  परम्परा और रूढ़ि का, धर्म और ढकोसले का फर्क करना सीखो। तो सभी पार्टियों में दक्षिणपंथ ने अपने वैचारिकी से घुसपैठ बनाई है। इसमें सपा तो घनघोर तरीके से फंस गई है क्योंकि जैसे ही वह अल्पसंख्यक इशु उठाती है  या उन्हें आगे करती है उसका ये दक्षिणपंथी माइंडेड युवा रिएक्ट कर जाता है । जबकि लोहिया ने साफ़ कहा था – ‘ बिना डर और  लागलपेट के, समाजवादियों को मुसलमानों के सवाल उठाने चाहिए.उनके कट्ठ्मुल्लापन की सहायता नहीं करनी चाहिए पर जो भी हिंदू कहीं मुसलमानों से अलगाव का बर्ताव करे, उन्हें दोषी ठहराना चाहिए . महान उद्धेश्यों  के लिए तैयार रहना चाहिए. जिस दल में वक्ती तौर पर अलोकप्रिय बनने का साहस नहीं होता वह कभी समाज परिवर्तन नहीं कर सकता.’’      
सुनील यादव 
यायावर और चिंतक

‘लोक और वेद आमने-सामने’ पुस्तक का लोकार्पण और परिचर्चा


पुनर्पाठ की जो परम्परा ज्योतिबा फुले ने 19 वीं सदी में शुरू की उसे ही इस पुस्तक के माध्यम से चौथीराम यादव आगे बढ़ा रहे हैं- प्रो वीर भारत तलवार
प्रो चौथीराम यादव की ‘पुस्तक लोक और वेद आमने-सामने’ का लोकार्पण 10 जनवरी को विश्वपुस्तक मेला में प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव, प्रख्यात पत्रकार उर्मिलेश, साहित्य चिंतक और दलित रचनाकार मोहनदास नैमिशराय, प्रोफेसर गोपेश्वर सिंह, कवि मदन कश्यप और आलोचक विनोद तिवारी जी के हाथों हुआ. इस पुस्तक पर चर्चा के लिए एक गोष्ठी जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र में 11 जनवरी को हुई . इस पुस्तक पर जिस तरह वैचारिक चर्चा होनी चाहिए थी वो चर्चा हुई । एक अनौपचारिक पुस्तक लोकार्पण के बाद बीज वक्तव्य देते हुए प्रोफेसर गोपेश्वर सिंह ने इस किताब के महत्व को स्वीकार किया, उन्होंने चौथीराम जी की मीरा और सूर के संदर्भ में नई व्याख्याओं की विस्तार से चर्चा करते हुए इस पुस्तक के गद्य को सुरुचिपूर्ण गद्य बताया । आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अंतर्विरोधों की चर्चा करते हुए प्रो गोपेश्वर सिंह ने कहा कि शुक्ल जी को ब्राह्मणवादी नहीं कह सकते हैं. अगर रामचंद्र शुक्ल को उनके अपने अंतर्विरोधों के कारण हम ब्राह्मणवादी कहते हैं तो एक तरह से तर्कवादी धारा को साम्प्रदायिक शक्तियों के हवाले करेंगे. अपने इसी वक्तव्य के आलोक में प्रो गोपेश्वर सिंह    ने रामचन्द्र शुक्ल संबंधी चौथीराम यादव की स्थापनाओं से अपनी असहमति दर्ज कराई . उन्होंने कहा कि अन्तर्विरोध तो बुद्ध के भी थे जिन्होंने अपने धम्म में स्त्री प्रवेश वर्जित किया था और बाद में बुद्ध के धम्म में स्त्री प्रवेश तो हुआ पर बुद्ध ने कह दिया कि जो धर्म एक हजार सालों तक चलना था वह पांच सौ वर्ष में ही खत्म हो जाएगा. इसी तरह आप कबीर के स्त्री संबंधी दृष्टि के अंतर्विरोधों को कहाँ रखेंगे?  गाँधी और करपात्री को क्या एक ही श्रेणी में रखेंगे? गोपेश्वर सिंह ने समन्वयवाद के संदर्भ में लोहिया और हजारीप्रसाद दिवेदी के विचारों के हवाले से चौथीराम जी की समन्वयवाद की स्थापनाओं पर सवाल खड़ा किया.
कथाकार नूर जहीर ने हिमांचल के लोक विमर्श के आलोक में ‘हिन्दू मिथक कथा विन्यास’ को नए संदर्भो में देखा और इस पुस्तक के महत्व को रेखांकित किया। प्रोफेसर हेमलता महिश्वर ने ब्राह्मणवाद, अत्यंज और शुद्र के विभाजन को साफ तौर पर रेखांकित किया।उन्होंने कहा कि जितना स्पेस की कामना हम अपने लिए करते हैं, उतना ही स्पेस किसी दूसरे को नहीं दे पाते हैं तो यही से ब्राह्मणवाद की शुरुवात होती है. यह पुस्तक भारतीय समाज के ज्वलंत सवालों को विमर्शकारी बनाती है. 
प्रो सूरज बहादुर थापा ने तनिका सरकार की वेद संबधी स्थापनाओं के आलोक में इस पुस्तक के स्थापनाओं की पड़ताल की। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक में मीरा पर अन्य आलोचकों से बिलकुल अलग स्थापना है. ‘पूरे मध्यकाल में मीरा को छोड़कर किसी कवि ने सत्ता पर बैठे व्यक्ति को मुर्ख नहीं कहा है.’ इस पुस्तक में ‘मध्यकालीन लोक जागरण और नारी मुक्ति’ तथा ‘नारी जागरण और मीराबाई का मुक्ति संघर्ष’ नामक लेखों में स्त्री विमर्श से संबंधित बिलकुल नया आख्यान है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल के भीतर के भाववाद और बाहर के वस्तुवाद को चिन्हित करते हुए प्रो थापा ने आचार्य शुक्ल संबंधी चौथीराम यादव की स्थापनाओं का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि रामचन्द्र शुक्ल वीरगाथा काल के नामकरण करते हुए जिन पुस्तकों को प्रतिबंधित करते हैं, उसमें 10 किताबें जैन साहित्य की हैं क्योंकि जैन साहित्य में हिन्दू मिथकों पर जो काव्य है वह मुख्यधारा के मिथकों से एकदम अलग है. ब्राह्मणवाद का समन्वय एक तरफ़ा है, वो अपने में शामिल करने की बात तो करता है पर वह दूसरे में शामिल नहीं होना चाहता.  इसीलिए इस समन्वयवाद में भारी झोल है, जिसका सटीक मूल्यांकन प्रो. चौथीराम यादव ने अपनी इस किताब में किया है. अपनी बात समाप्त करते हुए प्रो थापा ने बहुत व्यवस्थित ढंग से वाम के भीतर के ब्राह्मणवाद और साहित्य के भीतर के ब्राह्मणवाद से निर्णायक लड़ाई की बात की।
दिलीप मंडल ने इस पुस्तक को साहित्य के बजाय समाजशास्त्र की पुस्तक के रूप में देखा और यूरोप के रेनेसॉ के आलोक में मध्यकालीन साहित्य पर अपनी बात रखी। उन्होंने गाँधी-करपात्री की एक परम्परा और फुले, पेरियार, अम्बेडकर की दूसरी परम्परा की बात की. उन्होंने कहा कि सबसे पहले तो यही तय कर लेना चाहिए कि जिसे मुख्य धारा कहा जाता है क्या वह वाकई मुख्यधारा है क्या ? उन्होंने भारतीय मॉडर्ननिटी के अन्तर्विरोध पर विस्तार से बात की और कहा कि कायदे से मॉडर्ननिटी को परम्परा से टकराना चाहिए, लेकिन भारत में यह होता नहीं है.
प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव ने आज के संदर्भ में इस पुस्तक की क्या भूमिका हो सकती है, इसपर विस्तार से बात करते हुए कहा कि यह पुस्तक भक्तिकाल पर भले हो पर यह आज के संदर्भों की पुस्तक है. हिंदी की अकादमिक दुनिया में एक प्रवृत्ति बहुत तेज है. वह है  कबीर को ख़ारिज करने और तुलसी को स्थापित करने की. एक तरफ इस तरह की अकादमिक दुनिया है जो कबीर को ख़ारिज करने के लिए कह रही है कि ‘किसी कवि का मूल्यांकन उसके विचारों के आधार पर नहीं बल्कि उसकी कविता के आधार पर होना चाहिए.’ तो दूसरी तरह वह दुनियां है जिसमे कांचा इलैया की पुस्तक ‘पोस्ट हिंदू इण्डिया’ प्रतिबंधित करने की मांग जोरों पर है, तो इसके पीछे कौन सी शक्तियां हैं ? इस मुहिम के पीछे कौन लोग हैं? भीमा कोरे गाँव के पीछे कौन सी शक्तियां हैं? दाभोलकर, कलबुर्गी, पान्सारे, गौरी लंकेश की हत्या के पीछे कौन सी शक्तियां हैं? आप तय करते रहिए कि रामचंद्र शुक्ल ब्राह्मणवादी हैं कि नहीं. आप कहते रहिए कि उन्होंने जाति व्यवस्था के विरोध में लिखा है, लेकिन यह भी तो कहिए कि उन्होंने ‘गोस्वामी तुलसीदास’ नमक पुस्तक लिखी जिसमें कहा कि उंच-नीच की परम्परा हमेशा रही है और रहेगी. यह भी तो बताइए कि शुक्ल जी ने लेनिन के बारे में क्या लिखा है ? वर्गों के बारे में क्या लिखा है ? ये सब भुलाकर रामचंद्र शुक्ल को सेलेक्टिव तरीके से देखेंगे तो बात यही तक नहीं रुकेगी, बात तुलसी तक भी नहीं रुकेगी, बात कबीर को ख़ारिज करने तक पहुँच जाएगी. वीरेन्द्र यादव ने अपनी बात आगे बढाते हुए कहा कि अगर चौथीराम जी की यह  पुस्तक प्रतिरोध के महानायकों बुद्ध, कबीर, फुले, अम्बेडकर, पेरियार, भगत सिंह की स्मृति को समर्पित है, तो यह अनायास नहीं है. बल्कि चौथीराम जी ने इस पुस्तक के बहाने इसी प्रतिरोधी विचारधारा को आगे ले जाने के काम किया है. आज के राजनीति, समाज और साहित्य के समक्ष जो चुनौतियाँ हैं उसका केन्द्रीय अन्तर्विरोध ब्राह्मणवाद बनाम हाशिए के समाज का है. इसे समझना होगा.
प्रख्यात आलोचक वीरभारत तलवार ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन  में कहा कि इधर वर्षों से हिंदी में जो पुनर्पाठ की परम्परा विकशित हुई है, वह  इस किताब को समझने में महत्वपूर्ण है. यह पुनर्पाठ की परम्परा  19 वीं सदी में ज्योतिबा फुले से शुरू होती है. इस समाज में जो वर्चस्वशाली वर्ग हैं, जो ताकतवर वर्ग हैं उन्होंने बहुत से प्रतीक खड़े किए हुए हैं, बहुत सी पुराण कथाएँ बनाई हुई हैं, बहुत से देवी देवता प्रचलित किए हुए हैं. जो उनकी सत्ता की विचारधारात्मक पुष्टि करते हैं. उनकी सत्ता को टिकाए रखने का विचारधारात्मक आधार मुहैया कराते हैं. उस विचारधारा को पलटने के उद्देश्य से, उसके खिलाफ संघर्ष के लिए पुनर्पाठ की परम्परा ज्योतिबा फुले ने विकशित की. इसलिए आप इस पुनर्पाठ को कोई पुनर्मुल्यांकन मत समझिए. दरअसल यह पुनर्पाठ इस समाज में चले आ रहे शक्ति समीकरण को बदलने के संघर्ष का अंग है. इस अर्थ में उसका एक राजनीतिक चरित्र है. इसीलिए यह केवल पाठालोचन या पुनर्मूल्यांन का सवाल नहीं है. बल्कि यह राजनीतिक प्रक्रिया है. ज्योतिबा फुले ने बहुत सी प्रचलित कथाओं का फिर से एक नया रूप दिया, एक नया अर्थ दिया तथा नए मंतव्य निकाले. जिसने बहुजन समाज की राजनीतिक और सामाजिक चेतना को क्रन्तिकारी रूप से बदल दिया. 19 वीं सदी में बहुजन लोग इस स्थिति में नहीं थे कि वे कोई राजनीतिक लडाई लड़ पाते. इसीलिए यह समाज को बदलने की लडाई संस्कृति और धर्म के क्षेत्र में शुरू हुई.  धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में एक नई चेतना को पैदा करके ज्योतिबा फुले ने इन वर्गों के अन्दर एक नया आत्मविश्वास और दृष्टिकोण पैदा किया. यह वही आधार था जिसके बल पर ये वर्ग अपनी राजनीतिक लडाई लड़ने में समर्थ हो सके. सामाजिक समीकरण बदल देने की यह जो ज्योतिबा फुले की पुनर्पाठ  परम्परा है इसका प्रभाव हिंदी में बहुत देर से आया. 1970 के आसपास हिंदी में पुनर्पाठ की परम्परा शुरू होती है. सबसे पहले स्त्री प्रश्न पर और उसके बाद दलित प्रश्न पर और उसके भी बहुत बाद आदिवासी प्रश्न पर. यह जो पुनर्पाठ की परम्परा हैं  इसकी खासियत यह है कि यह सारे परिप्रेक्ष्य को बदल देने का, सारे संदर्भों को बदल देने का, सारे अंतर्विरोधों में एक प्रधान अन्तर्विरोध खड़ा कर देने का विचारधारात्मक संघर्ष है.  यह ज्ञान की एक प्रक्रिया है.  ध्यान रखना चाहिए कि ज्ञान की प्रक्रिया हमेंशा सामूहिक होती है. चौथीराम जी की किताब इसी सामूहिक ज्ञान के प्रक्रिया की एक कड़ी है. चौथीराम जी ने जो यह कड़ी विकशित की है, उसमें बहुत से विचारों का समाहार है.  उन्होंने अपने वक्तव्य के अंत में कहा कि इस पुस्तक के केंद्र में जाति का सवाल ही है। वह इसलिए भी है क्योंकि भारतीय समाज का केन्द्रीय प्रश्न ही जाति का प्रश्न है.  भारतीय वामपंथ या कोई भी आंदोलन जाति के सवाल को ट्रेस किए बिना जन भागीदारी हासिल नही कर सकता।
कार्यक्रम का आयोजन जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध छात्रों ने किया था जिसका संचालन जेएनयू के एसोसिएट प्रोफेसर गंगासहाय मीणा ने किया तथा  धन्यवाद ज्ञापन  सोनम मौर्य ने किया।
सुनील यादव
यायावर और चिंतक
गाजीपुर, उत्तर प्रदेश

भारत विभाजन साम्प्रदायिकताऔर हिंदी उपन्यास


अरविंद यादव


        विभाजन धर्म को आधार बनाकर हुआ था इस विभाजन के साथ साम्प्रदायिकता का जो उभार शुरू हुआ वह स्वतंत्रता के बाद के समाज को व्यापक रूप से अपने चपेट में लेता है। सत्ता प्राप्ति के लिए राजनीति धर्म को साम्प्रदायिक रंग में रंग देती है। इसका सीधा प्रभाव समाज पर देखने को मिलता है। जिसकी शुरूआत भारत विभाजन से बंगाल नोवाखली से होती हुऐ आज तक जारी है साम्प्रदायिक समस्याओं तथा विभाजन को केन्द्र में रखकर भारत और पाकिस्तान दोनों जगह के रचनाकारों ने विभाजन से उत्पन्न विस्थापन और हिंसा से पैदा दुखों को अभिव्यकत दी है। हिन्दी साहित्य में विशेषतः उपन्यास में इस साम्प्रदायिक समस्या तथा विभाजन के दर्द को सामाजिक चेतना तथा व्यक्ति की मनोदशा को पूर्ण गहराई के साथ व्यक्त किया गया ‘‘ये उपन्यास विभाजन की राजनीति का तीव्र विरोध करते है। और स्पष्ट कर देते है कि देश की जनता ने इस देश का विभाजन स्वीकार नहीं किया विभाजन की स्वीकृति कांग्रेस और मुस्लिम लीग की उच्च स्तरीय बैठक तक ही सीमित रह गयी, लेकिन इस स्वीकृति का सबसे बड़ा मूल्य देश की जनता को चुकाना पड़ा जो पाकिस्तान का अर्थ बिल्कुल नहीं समझाती थी।’’1
          हिन्दी उपन्यासकारों ने उन शक्तियों के निजी स्वार्थों को उद्घाटित किया जो देश के विकास में बाधा डालती है तथा उनके उस चरित्र की शिनाख्ख्त की जो साम्प्रदायिकता का बीच बोकर दंगा करवाती है। साम्प्रदायिकता से जो तबका सबसे अधिक प्रभावित होता है उपन्यास को उसी तबके जीवन का महाकाव्य कहा गया है। इसीलिए साम्प्रदायिकता तथा भारत विभाजन से संबंधित उपन्यासों की हिन्दी में एक लम्बी परम्परा रही है ‘‘उपन्यास की चेतना, पूँजीवादी समाज रचना के उल्लास भरे व्यक्ति के सामाजिक संबंधों और उसके संघर्षों से निर्मित हुई है।’’2
          ‘‘पूँजीवादी सभ्यता में यथार्थ के जो नये-नये आयाम और भौतिकवादी चिन्तक मूल्य प्रश्न बन कर उभरे है, उन्हें व्यक्त करने में उपन्यास जैसी यथार्थवादी विधा ही कारगर हो सकती है। जब हम कहते है कि उपन्यास आधुनिक युग का महाकाव्य है तो इसका अर्थ यह होता है कि जैसे महाकाव्यों में जगत जीवन की विराटता अपने समस्त वैविध्य गहरे भाव बोध विशिष्ठ दर्शन मानव मूल्य और प्रश्नों के साथ अंकित होता है। उसी प्रकार उपन्यास में भी।’’3 लेकिन आज के जीवन की समस्त जटिलता यथार्थ के विविध सूक्ष्म आयाम दैनिक जीवन के सामान्य से दिखने वाले व्यापार नये परिवेश महाकाव्यों में नहीं व्यक्त हो सकते, इसको व्यक्त करने के लिए उपन्यास की जरूरत पड़ती है। समाज का उपन्यास के साथ रिश्ता उपरोक्त सूत्रों से अन्र्तगुंफित दिखाई देता है।
          भारत विभाजन तथा साम्प्रदायिक दंगो की अमानवीय त्रासदी को व्यक्त करने वाले प्रथम उपन्यासकार देवेन्द्र सत्यार्थी थे। उन्होंने अपने उपन्यास कठपुतली (1974) में भारत से पाकिस्तान जाने वाले तथा पाकिस्तान से भारत आने वाले काफिलो का बड़ा मार्मिक चित्रण किया है। साम्प्रदायिक दंगो का संवेदना पूर्ण अंकन इस उपन्यास में हुआ है। सत्यार्थी के बाद यशपाल का ‘झूठा सच’ (1958) आता है। यशपाल ने इस उपन्यास में विभाजन के उपरान्त त्रासदी और भय को बड़े ही सलीके से प्रस्तुत किया है। गोपाल राय लिखते है कि ‘‘मुस्लिम लीग और सिखा नेताओं के भड़काऊ भाषण और बहुसंख्यक मुस्लिम समाज के आक्रमण तेवरों की छाया में लाहौर के गली-कूचों में कुलबुलाती दहशत की मानसिकता में घुटती अल्पसंख्यकों की जिन्दगी का ऐसा यथार्थ और जीवंत अंकन इससे पूर्व किसी उपन्यास में नहीं हुआ।’’4 विभाजन के बाद विस्थापितों की समस्या को उठाते हुए यशपाल विभाजन के मूल में आर्थिक और राजनीतिक स्वार्थों तथा रक्तरंजित साजिशों की भी शिनाख्त करते है। सदुर्शन मल्होत्रा लिखते है कि ‘‘पंजाबी हिन्दुओं तथा मुस्लिम परिवारों के रहन-सहन तथा उसके सामाजिक जीवन के चित्र नेत्रों के समक्ष घूम जाते हैं। यशपाल की पैनी दृष्टि से कोई वस्तु नहीं छूट सकी है।’’5
          ‘झूठा सच’ के बाद कमलंश्वर का ‘लौटे हुऐ मुसाफिर’ (1961) आता है। यह उपन्यास विभाजन के फलस्वरूप उत्पन्न साम्प्रदायिक दंगों को तो चित्रित करता है, साथ ही साथ मुसलमानों के उस मोह भंग का भी चित्रण करता है जिसमें पाकिस्तान के नाम पर छले गये।
          भीष्म साहनी एक ऐसे कथाकार है जिन्होंने विभाजन का दर्द सहा था, उनका उपन्यास ‘तमस’ (1973) उनके इस भोगे हुए दर्द के अनुभवों को व्यक्त करता है ‘तमस उस अंधकार का द्योतक है जो आदमी की आदमीय और संवेदना को ढक लेता है और उसे हैवान बना देता है। भीष्म साहनी ने उन स्थितियों और कारणों के विश्लेषण का प्रयत्न किया जो देश के विभाजन और साम्प्रदायिकता के मूल में थे।’’6 विभाजन और साम्प्रदायिकता के कारणों की शिनाख्त करते हुए साहनी इतिहास के उन पन्नों तक जाते है, जिसमें ब्रिटिश फूट डालो राज करो की नीति स्पष्ट रूप से अंकित है ब्रिटिश नीति के उपरान्त मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्रीयता के सिद्धांत तथा भारत विभाजन तक साहनी पहुंचते है।
          भारत विभाजन के उपरान्त हुए दंगो ने भारतीय मुसलमानों को कार्ड स्तरों पर प्रभावित किया। अनेक उपन्यासकारों ने इसका अंकन किया। राही मासूम रज़ा ने आधा गाँव (1966) टोपी शुक्ला (1969) हिम्मत जौनपुरी (1969) ओस की बूँद (1970) दिल एक सादा कागज (1973) असंतोष के दिन (1986) आदि उपन्यासों में राही ने मुस्लिम सामाजिक परिवेश किसान मजदूर तथा जमीन के सवाल की समस्या तथा इसके पीछे काम कर रही धर्म के रंग में रंगी राजनीति, भारत में मुसलमानों की अस्मिता का सवाल आदि चीजों को गंभीरता से उठाते है।
          ‘‘आधा गाँव के केन्द्र में भी शिया सैयदो का सामंती कुलीन तंत्र ही है लेकिन मुस्लिम जमींदारों की कुलीनता के छदम को जिस अंतरंगता व नैतिक साहस के साथ राही मासूम रजा ने इस उपन्यास ‘आधा गाँव’ में विभाजन साम्प्रदायिकता और मुस्लिम अस्मिता के प्रश्न को उसकी सम्पूर्ण संशलिष्टता में कथात्मक बनाया गया है।’’7
          देश विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल और बिहार से पाकिस्तान गये मुसलमानों को बंगाली व बिहारी कहकर उनमें जो भेद किया गया, उससे उनमें पाकिस्तान के प्रति मोहभंग हो गया तो भारत में अपने संबंधियों से मिलने के लिए तड़पते है छटपटाते है पर कानून उन्हें लौटने की इजाजत नहीं देता।
          मुस्लिम जीवन का गम्भीर अंकन करते हुए शानी का ‘काला जल’ आता है। जिसमें निम्न मध्यम वर्गीय मुस्लिम समाज का प्रमाणिक दस्तोवज प्रस्तुत करते हुए मुसलमानों की मानसिकता, निजी जीवन तथा संस्कृति का उद्घाटन वे करते है।
          मंजूर एहतेशाम ने ‘सूखा बरगद’ में ये दिखाने की कोशिश की कि विभाजन के बाद भारतीय मुसलमानों में क्या बदलाव आये, इस देश में धर्म किस तरह सामाजिक संबंधों के बीच दराद पैदा कर देता है। इन सारे सवालो को एहतेशाम अपने उपन्यास में उठाते है।
          नासिरा शर्मा का ‘जिन्दा मुहावरे’ (1993) ‘‘विभाजन के बाद भारत में रह रहे मुसलमानों के प्रति बहुसंख्यक समाज में अविश्वास का माहौल बनने और उनकी वतन परस्ती के प्रति संदेह करने का चित्रण हुआ है।’’8  इनका दूसरा उपन्यास ‘ठीकरे की मँगनी’ मुस्लिम सामाजिक समस्याओं व रीति रिवाज से जुड़ा है।
          अब्दुल बिस्मिल्ला के उपन्यास ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ में बुनकरों के अभाव ग्रस्त व नारकीय जिंदगी को उसके समस्त भयावहता के साथ प्रस्तुत किया गया है। मुस्लिम समाज में फैली तमाम कुरीतियों अन्धविश्वासों तथा मजहबी कट्टरपन और साम्प्रदायिक सोच को भी दिखाया गया है, उनके दूसरे उपन्यास ‘मुखड़ा क्या देखें’ (1996) में दलित मुस्लिम समाज के यथार्थ के साथ ही गांव में हो रहे परिवर्तनों विशेषकर साम्प्रदायिकता पर चिन्ता व्यक्त की गयी है।
          साम्प्रदायिक द्वेष तथा उससे उत्पन्न होने वाले दंगो का सचित्र चित्रण विभूति नारायण राय के उपन्यास ‘शहर में कफ्र्यू’ (1986) में हुआ है, इसमें दंगे करवाने वाली राजनीतिक ताकतों तथा उसमें पुलिस प्रशासन एवं मीडिया की भूमिका की शिनाख्त करते हुए ये दिखाया गया है कि दंगो से प्रभावित वही जनता होती है जिसके सर पर न छत है न खाने को रोटी।
          साम्प्रदायिक संदर्भ वाले उपन्यासों की एक लम्बी सूची सदी के अन्तिम दशक में प्राप्त होती है। भगवान दास मोरवाल के ‘काला पहाण’ उपन्यास में मोरवाल ने ये दिखाने की कोशिश की है कि किस प्रकार सीधी-सीधी जनता के बीच अकवाह फैलाकर उनके भीतर अविश्वास आंतक तथा भय पैदा किया जाता है। इसमें धर्म की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। जनता का धार्मिक जुनून जिसका उपयोग राजनीति अपने हित के लिए करती है, साम्प्रदायिक दंगो में बदल जाता है। बाबरी विध्वंश के बाद हुए दंगे अल्पसंख्यक हिन्दुओं का पलायन इस उपन्यास में फैला हुआ है।
          प्रियंवद का उपन्यास ‘वे वहाँ कैद है’ (1994) फाँसीवादी उभार और साम्प्रदायिक सोच के पीछे काम करने वाली शक्तियों की शिनाख्त करता है। संवेदना प्रियंवद की ताकत है, जिसमें वैचारिक तटस्थता ईमानदारी और संवेदना शीलता व्यक्त होती है। बाबरी मस्जिद विघ्वंश के बाद ‘‘हिन्दुत्ववादी राजनीति जिस प्रकार त्रिसूल में तब्दील हो गयी थी, और आंतक के टुकड़े तान-तान कर हवा में फेके जा रहे थे, कोई भी संवेदनशील लेखक उससे अलक्षित नहीं रह सकता। प्रियवंद ने इस दौरान हताहत भारतीय मन को इस उपन्यास को माध्सम से अभिव्यक्ति दी।’9 वे हिन्दूवादी साम्प्रदायिक राजनीति का उभार ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज को रखकर इस उपन्यास में एक विमर्श रचते है।
          गीतांजलि श्री का उपन्यास ‘हमारा शहर उस बरस’ (1998) भी प्रियवंद के इसी उपन्यास के प्रकृति की रचना है। इसमें प्रियवंद के उपन्यास का प्रभाव देखा जा सकता है। अलका सरावगी का उपन्यास ‘कलिकथा वाया बाईपास’ (1998) में सभ्यता समीक्षा जैसी कड़ी चुनौती को स्वीकार किया गया है। ‘हमारा शहर उस बरस’ की तरह ये उपन्यास भी कई बहसों और विमर्शों को जन्म देता है।
          भगवान सिंह का उपन्यास ‘उन्माद’ (1999) साम्प्रदायिक उन्माद के चरित्र का उद्घाटन करता है। यह उपन्यास अपने पूर्ववर्ती साम्प्रदायिकता की समस्या पर लिखे गये उपन्यासों से ‘साम्प्रदायिकता’ और फाँसीवाद को लेकर नितान्त भिन्न प्रकृति और दृष्टिकोण अपनाता है। भगवान सिंह साम्प्रदायिकता को निश्चित सामाजिक व राजनीतिक दृष्टिकोण का परिणाम न मानकर इसे मनोविकार व दमित व्यक्तित्व की विकृत परिणातियों के रूप में प्रस्तुत करते है।’’10
          मुर्शरफ आलम ज़ौकी का ‘बयान’ (1998) महत्वपूर्ण उपन्यास है। भारतीय समाज में मुसलमानों की दशा व अस्मिता के सवाल, बाबरी विध्वंश के बाद भाजपा जैसी हिन्दुत्ववादी पार्टी के उभार के साथ मुसलमानों के भय को उपन्यासकार अपने समय की राजनीतिक स्थितियों में बहुत सच्चाई के साथ चित्रित करता है। इस उपन्यास का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि हिन्दू-मुस्लिम साझी संस्कृति, तहजीब तथा भाषा का जो रिश्ता कई सौ वर्षों से चला आ रहा था। उसे साम्प्रदायिकतावादी ताकतों ने अपने हित के लिए किस तरह से छिन्न-भिन्न कर दिया। बाल मुकुन्द शर्मा जोश और बरकत हुसैन इसी साझी संस्कृति और परम्परा के दो नाम है जो इस उपन्यास में नष्ट होते दिखाई देते है। ज़ौकी के साम्प्रदायिकता से जुड़े अन्य उपन्यासों में ‘मुसलमानों’ ‘शहर चुप है’ और ‘नीलामघर’ प्रमुख है।
          कमलेश्वर का उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ (2000) एक सभ्यता समीक्षा का  उपन्यास है। पाकिस्तान यहाँ सिर्फ एक प्रतीक है, जिसका जन्म लाखों लोगों की बली देने के उपरान्त और लाखों को अपनी जमीन ये जुदा करने की तर्ज पर हुआ था। कितने पाकिस्तान में कमलेश्वर पूरे विश्व के इतिहास की समीक्षा करते हुए दिखाने की कोशिश करते है, कि पाकिस्तान बनने की कब-कब नौबत आयी और धर्म एवं इतिहास की बलत व्याख्या करके मानवता को कुचलने की कोशिश की गयी है। आज के समय में हर जगह बारूद ही बारूद है, कब कोई एक तीली जला दे और मुल्क जल उठे। यह निश्चित नहीं है इसलिए हर समय व्यक्ति भय आतंक व घुटन का शिकार है-
          ‘‘इन बंद कमरों में साँस घुटी जाती है
          खिड़किया खेलता हूँ तो जहरीली हवा आती है।’’11
दूधनाथ सिंह का उपन्यास ‘आचारी कलाम’ (2000) जो बाबरी विध्वंश पृष्ठभूमि पर आधारित है ‘‘साम्प्रदायिकता और धर्म निरपेक्षता जैसे जटिल मुद्दों को समझने का यह एक नया परिप्रेक्ष्य भी है। 6 दिसम्बर 1992 की घटनाओं के केन्द्र में यह औपन्यासिक आख्यान भारतीय समाज के पार्टीशन की उन जड़ो तक पहुँचने की कोशिश है, जिसे धर्म निरपेक्षाता के फार्मूले से पाटे जाने की जितनी कोशिश होती रही है, उतना ही तो बढ़ता गया है। यह उपन्यास धर्म निरपेक्षता का ही नहीं बल्कि नहीं का भी क्रिटीक रचता है।’’12
          असगर वज़ाहत का उपन्यास ‘कैसी आगी लगाई’ (2004) जीवन की विशद् व्याख्या है। उनके उपन्यास ‘सात आसमान’ में अगर मुस्लिम सामाजिक अन्तर्विरोध देखने को मिलते है। तो कैसी आगी लगाई उस सामाजिक अन्तर्विरोध से जन्मा वैचारिक संघर्ष भी पैदा करता है। इसमें साम्प्रदायिकता, छात्र जीवन, स्वतंत्रोतर राजनीति, सामन्तवाद, वामपंथी रानीति छोटे शहरों का जीवन तथा महानगरों, की आपा-धापी को बखूबी उभारा गया है।
          इस प्रकार स्वतंत्रता के बाद साम्प्रदायिक संदर्भ वाले उपन्यासों की एक लम्बी परम्परा देखने को मिलती है। जिसमें उपन्यासकारों ने अपने दृष्टिकोण से साम्प्रदायिक राजनैतिक ताकतों धर्म के ठेकेदारों के साथ-साथ दंगो से प्रभावित होने वाली जनता का चित्रण भारतीय परिप्रेक्ष्य में किया है।
संदर्भ सूची -
1.  हरियश-भारत विभाजन और हिन्दी उपन्यास पृ. सं. 339
2. सं. जैन नेमिचंद्र-मुक्तिबोध रचनावली खण्ड-5, पृ. सं. 369
3. रामदरस मिश्र, हिन्दी उपन्यास एक अन्र्तयात्रा, पृ. सं. 13
4. राय गोपाल, हिदी उपन्यास का इतिहास, पृ. सं. 33
5. महोत्रा सुदर्शन, यशपाल के उपन्यासों का मूल्यांकन पृ. सं. 188
6. यादव वीरन्द्र, उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता, पृ. सं.75
7. यादव वीरन्द्र, उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता, पृ. सं.75
8. राय गोपाल, हिदी उपन्यास का इतिहास, पृ. सं. 435
9. सं. श्रीवास्तव परमानन्द, आलोचना अंक अप्रैल- जून, 2000 पृ. सं. 239
10. यादव वीरन्द्र, उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता, पृ. सं.75
11. कमलेश्वर, कितने पाकिस्तान की भूमिका से
12. यादव वीरन्द्र, उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता, पृ. सं.212
                                                                                  
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