Thursday, 4 August 2016

कैसा देश बना रहे हैं हम!



उर्मिलेश

हर साल अगस्त आते ही आजादी की याद आने लगती है। पर आजादी के सत्तरवें साल में प्रवेश करते हुए क्या हम यकीन के साथ कह सकते हैं कि आजाद होते देश ने ‘नियति के साथ जो वादा’ किया, वह सही दिशा में है! गरीबी हटाने, शोषण-उत्पीड़न खत्म करने, सबको शिक्षित व सेहतमंद बनाने और सेक्युलर-लोकतांत्रिक समाज गठित करने का सपना क्यों नहीं पूरा हुआ! औपनिवेशक दासता, राजशाही या गृहयुद्धों से मुक्त हुए कुछ देश हमसे भी बुरी हालत में हैं पर कई हमसे बहुत अच्छी स्थिति में हैं। इन देशों ने जिस तरह की आर्थिक प्रगति और मानव विकास सूचकांक, खासकर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उछाल हासिल किया, उसके आगे हम कहीं नहीं ठहरते। इसका सीधा मतलब है कि जन सरोकार के बड़े मुद्दे हमारे शासकों की प्राथमिकता नहीं बने। हमने अवाम के बदले अभिजन को केंद्र में रखा, ठोस मसलों के बजाय ‘वोट-बटोरू मुद्दों’ पर जोर दिया। यह सिर्फ किसी एक व्यक्ति, एक दल या एक सरकार की बात नहीं,य़ह हमारा राष्ट्रीय स्वभाव बन गया।
क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि आजकल ज्यादातर नेता जनता के बीच काम करके नहीं, टीवी पर्दे पर चीख-पुकार से बनते हैं! कुछ ‘राष्ट्रवादी संगठनों’ की अपनी-अपनी ‘निजी सेनाएं’ सक्रिय हैं, जो कभी ‘गो-रक्षा’ के नाम पर तो कभी अंतरजातीय-अंतरधर्मीय प्रेम या विवाह रोकने के नाम पर ‘लव-जिहाद विरोधी’ हथियारबंद अभियान चलाती हैं। ठोस एजेंडा और वैकल्पिक मॉडल-विहीन विपक्ष उसके निष्किय निन्दा-अभियान में जुटता है। ऐसे में ‘सर्वजन हिताय’, ‘सामाजिक न्याय’ या ‘सबका साथ-सबका विकास’ को जमीनी असलियत बनाना कैसे संभव है! लोकतंत्र को अंगीकार करने के बावजूद सामंती-औपनिवेशक दौर की हमारी संकीर्णताएं-कुंठाएं हमारे समाज में रची-बसी हैं। इन सबके साथ हम तरक्की का रास्ता तलाश रहे हैं। शिक्षा और जन-स्वास्थ्य का मौजूदा परिदृश्य हमारी भटकी प्राथमिकताओं का सबसे बड़ा उदाहरण है। दोनों क्षेत्रों के निजीकरण की तेज रफ्तार ने हमें आतंकवाद या उग्रवाद से भी ज्यादा क्षति पहुंचाई है। विश्वबैंक-आईएमएफ-अमेरिका की सिफारिश पर हम जीएसटी लागू कराने या तमाम सेक्टरों में सौ फीसदी एफडीआई के लिये बैचैन हैं। लेकिन जन-स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च बढ़ाने की विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिश हरगिज नहीं मानते! स्वास्थ्य का मुद्दा सिर्फ किसी व्यक्ति की जिन्दगी से जुड़ा नहीं है, वह उसके पूरे परिवार और इस तरह देश की आर्थिक तरक्की से भी जुड़ा है। गंभीर बीमारी के चलते किसी व्यक्ति का खाता-पीता मध्यवर्गीय या निम्न मध्यवर्गीय परिवार अचानक गरीबी रेखा के नीचे खिसक जाता है।
आईआईटी-एमबीए के संस्थानों और ‘जेएनयू या टिस’ जैसे प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्रों के बावजूद प्राथमिक और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हम लगातार पिछड़ रहे हैं। आविष्कार-इनोवेशन क्षेत्र में हम कहां हैं? इन सवालों पर विचार करने के बजाय देश के कुछ गिने-चुने प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्रों को प्राचीन-शैली के गुरूकुलों जैसा बनाने की बात चल रही है! अंतरराष्ट्रीय मानक पर पहले से पिछड़े हमारे संस्थान फिर कहां ठहरेंगे? आखिर ‘सुधार’ का यह कैसा राजनीतिक-अर्थशास्त्र है, जिसमें हमारी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार का इतना बुरा हाल हो रहा है? क्या ये तथ्य हमारी भटकी प्राथमिकताओं के ठोस सबूत नहीं हैं? जन-मुद्दों की यहां मैं लंबी-चौड़ी फेहरिश्त पेश नहीं करना चाहता। सिर्फ एक छोटा उदाहरण। क्या लोगों को यह बात नहीं मालूम कि बुलेट ट्रेनों से ज्यादा जरूरी हैं-समय से चलने वाली ज्यादा से ज्यादा रेलें, ज्यादा बर्थ, लाइनों का विस्तार, 12000 से ज्यादा जोखिम भरी रेलवे क्रांसिंग पर ओवरब्रिज, अंडरपास या आटोमेटिक रेलवेगेट। पर सरकार की प्राथमिकता कई लाख करोड़ रुपये की लागत वाली मुम्बई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन, दिल्ली-आगरा जैसे शहरों के बीच स्पीड ट्रेन, मोनो ट्रेन या अनेक बड़े-मझोले शहरों में मेट्रो चलाने पर है। मैं रेलवे के आधुनिकीकरण की सारी परियोजनाओं के खिलाफ नहीं हूं। लेकिन जिस देश में सिर्फ 60 हजार करोड़ खर्च करके असुरक्षित रेलवे-क्रांसिंग को सुरक्षित बनाया जा सकता है, वहां प्राथमिकता किसे मिलनी चाहिये? कुछ सौ करोड़ से हजारों की संख्या में रेल-बर्थ बढ़ सकते हैं। फिर लाख करोड़ वाली बुलेट ट्रेन क्या बाद में नहीं दौड़ सकती?
इन दिनों स्मार्ट सिटी की बात हो रही है, स्मार्ट विलेज की क्यों नहीं? बजट देखिये तो 100 करोड़। क्या 100 करोड़ से एक स्मार्ट सिटी बनता है? स्वच्छता अभियान की बात हो रही है पर सफाई में लगे लोगों का जीवन नारकीय बना हुआ है। आजादी के बाद भी सफाई की जिम्मेदारी समाज के खास ‘निम्नवर्णीय’ हिस्से की ही क्यों है? प्रति वर्ष 100 से अधिक सफाईकर्मी गटर या मेनहोल में गिरकर या उससे निकलती गैसों के शिकार होते हैं। क्या दुनिया के किसी अन्य बड़े मुल्क में ऐसा होता है?  दुनिया के किस मुल्क में मरी गाय की चमड़ी निकालने वाले लोगों को कुछ लोग गौरक्षा के नाम पर पीटते या उनकी जान लेते हैं? बेरोजगार और निराश युवाओं के लिये एक और अभियान जारी है। सांप्रदायिकता, जातिवाद, टीवी चैनलों के झूठ-मक्कारी भरे रियल्टी शो और कथित मनोरंजन के फूहड़ कार्यक्रमों के मेल से युवाओं को खास तरह की ‘आक्रामक भीड़’ में तब्दील किया जा रहा है।
इसमें शायद ही किसी को संदेह हो कि शासन लगातार कारपोरेट-हितों की तरफ झुकता गया है। इसके लिये अब वह खुले तौर पर दलील भी देता है कि गरीबी-बेरोजगारी जैसी समस्याओं का समाधान कारपोरेट के ‘विस्तार-विकास’ से हो सकेगा। सरकारों को किसी तरह के कारोबार में नहीं उतरना चाहिये, यह काम कारपोरेट का है। सवाल उठता है, इन कारपोरेट-घरानों में कितनों के पास अपने विकास के अलावा देश के सामाजिक-आर्थिक विकास का कोई मॉडल या सोच भी है? इस दौर में अमीर लोगों का एक समूह इस कदर अमीर बना कि इनमें कुछ दुनिया के शीर्ष अमीरों की सूची में स्थायी तौर पर दर्ज हैं। भारतीय गरीबी के दूर तक फैले रेगिस्तान में वे हरे-भरे नखलिस्तान जैसे लगते हैं। नेशनल सैंपल सर्वे संगठन(एनएसएसओ) के ताजा आंकड़े भी बताते हैं कि ‘सुधारों’ के दौर में अमीरी-गरीबी के बीच खाई तेजी से बढ़ रही है। इस बड़ी समस्या को संबोधित करने के बजाय हमारे शासकों का एजेंडा ही अलग है। वे देश के तेजी से फैलते विशाल मध्यवर्ग को देखकर मुग्ध हैं। आर्थिक सुधारों का सबसे अधिक फायदा अगर कारपोरेट के बाद किसी को मिला तो वह शहरी उच्च और मध्यवर्ग ही है। इसका बड़ा हिस्सा उच्चवर्णीय है। शासक-योजनाकारों को लगता है, यही वर्ग उनका असल संकटमोचक है। किसी तरह के गुणात्मक बदलाव की राजनीति या बड़े जन आंदोलन को भी यही मध्यवर्ग रोकेगा। इनके आर्थिक और योजना सलाहकार बता रहे हैं कि उच्च विकास-दर बनाए रखने के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश(एफडीआई) लाने जैसी पहल की जरूरत है। उच्च विकास दर का फायदा अंततः नीचे तक जाएगा(ट्रिकल डाउन थिउरी) और गरीबी अपने आप खत्म हो जाएगी। आखिर हम विश्वबैंक-आईएमएफ के इस ‘टपकन(ट्रिकल डाउन) सिद्धांत’ में क्यों यकीन कर रहे हैं, जब कि दुनिया के अनेक विकासशील देशों में इसकी पोल खुल चुकी है!
मुझे लगता है, समय गंवाए बगैर राजनीति और गवर्नेंस की कार्यदिशा में जरूरी बदलाव नहीं हुआ तो आगे का वक्त हमारे समाज के लिए तूफानी और खतरनाक साबित हो सकता है। दुखद है कि हमारे शासकों के पास बदलाव की कोई रणनीति नहीं है। डा. आंबेडकर ने बहुत पहले आगाह किया था, ‘26 जनवरी, 1950 को हम अंतविर्रोधों के जीवन में दाखिल होने जा रहे हैं। राजनीति के स्तर पर तो हमारे समाज में समानता होगी लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता होगी। राजनीति में ‘एक व्यक्ति-एक वोट-एक हैसियत’ का सिद्धांत लागू रहेगा लेकिन सामाजिक-आर्थिक जीवन में ‘एक व्यक्ति-एक वोट-एक हैसियत’ के सिद्धांत को नजरंदाज किया जाता रहेगा। हमें अपने समाज के इस अंतविर्रोध को जल्दी से जल्दी खत्म करना होगा। अगर ऐसा नहीं किया गया तो जो लोग असमानता के शिकार हैं, एक दिन वे लोकतंत्र की ऐसी संचरना को ध्वस्त करने में जुटेंगे।’ विडम्बना यह है कि हमारे योजनाकारों और नेताओं ने डा.आंबेडकर के इस महत्वपूर्ण आह्वान को भुला दिया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है, कैसा देश बना रहे हैं हम? किधर जा रहा है देश?
-------------------------------------------------------------------------------------------(लेखक राज्यसभा टेलीविजन के पूर्व कार्यकारी संपादक हैं और स्तम्भकार हैं)
31,जुलाई,16




Wednesday, 6 July 2016

‘राजनीति में जातिवाद’ सवर्णवादी कुंठा से निकला एक मुहावरा है



सुनील यादव

यह जातियों के राजनीतिकरण का ही परिणाम है कि किसी प्रदेश में होने वाले चुनाव से पहले वहाँ के जातीय समीकरण के अनुसार केंद्र में मंत्रीयों का चयन हो जाता है । रजनी कोठारी ने कहा था कि ''जिसे राजनीति में जातिवाद कहा जाता है वह मूलतः जातियों का राजनीतिकरण है ।'' सबसे ज्यादा 'जातिवादी राजनीति' का रोना रोने वाले लोग यह कभी नहीं चाहते थे कि जातियों का राजनीतिकरण हो ....क्योंकि जब जातियों का राजनीतिकरण नहीं हुआ था उस दौर में पिछड़े और दलितों के 300 घरों वाले गाँव में सिर्फ एक घर सवर्ण कितनी बार मुखिया बनता रहा .....यही स्थिति कमोवेश एमपी और एमएलए के चुनावों में भी रहती थी।....यह ध्यान रहे जातियों के राजनीतिकरण ने ही मुट्ठी भर वर्चस्वशाली जातियों के एकाधिकार को तोड़ा और इस लोकतन्त्र में आम जनता की सक्रिय भागीदारी हुई .......भारत में 90 प्रतिशत सवर्ण अपनी दोनों सवर्णवादी पार्टियों से जुड़े रहे/जुड़े हैं और तब तक राजनीति में जातिवाद नहीं था जब तक दलित पिछड़ो की राजनीतिक हिस्सेदारी नहीं थी।  पर जैसे ही दलित पिछड़ो में राजनीतिक समझदारी आयी उन्होने इस देश की लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में अपनी उपस्थिती दर्ज कराई वैसे ही एक नया मुहावारा वर्चस्वशाली समूहों ने उछाला 'जातिवादी राजनीति'॥ यह मुहावरा मीडिया में बैठे उन तमाम सवर्णों का है जिन्हे जातिवार जनगणना से जातिवाद बढ़ने का सातिराना खतरा नजर आता है। यह मुहावरा उन्ही सवर्ण मीडिया वालों का है जिन्हे 90 प्रतिशत सवर्ण वोट लेकर लोकसभा चुनाव जीतने वाली भाजपा जातिवादी पार्टी नजर नहीं आती।      
 दरअसल ...जातियों के राजनीतिकरण के बाद जो पिछड़ा और दलित नेतृत्व उभरा उसमें से अधिकांश की समझदारी मानसिक गुलामी वाली थी। कुछ को छोड़ दें तो अधिकांश ने जिस वैचारिक एजेंडे पर अपनी राजनीति शुरू की थी उसी का गला घोटते नजर आए। जैसा की वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश कहते हैं कि ‘इन  दलित, पिछड़े नेतृत्व ने कभी अपने समाज के पढे लिखे लोगों को महत्व नहीं दिया।’ यह कोई मामूली बात नहीं है यह एक भयानक किस्म का  सच है जो अपने इतिहास को दोहरा रहा है। वह इतिहास जिसमें संत साहित्य के क्रांतिकारी सामाजिक विचारों और न्याय की लड़ाई को तुलसीदास जैसे ब्राह्मण कवियों ने पूरी तरह खत्म कर देने कि कोशिश की। आज यही हो रहा है सामाजिक न्याय की मसीहाई का दावा करने वाली अधिकांश पार्टियों ने अपने करीब एक सवर्ण अल्पजन की इस तरह की  जमात खड़ी कर ली है जो अपने सुझाओ से इन पार्टियों को खत्म करने पर तुले हुए हैं। ये सवर्ण अल्पजन ही इन पिछड़े दलित नेताओं को सबसे बड़े वैचारिक साझेदार हैं। उर्मिलेश जी इसी बात को इस ढंग से कहते हैं कि ‘जब कभी पढ़े-लिखों से वे कभी किसी वजह से 'निकटता या सहजता' महसूस करते हैं तो वे सिफ॓ उच्चवणी॓य पृष्ठभूमि वाले होते हैं. पिछडो़-दलितों में वे सिफ॓ अपने लिये कुछ बाहुबली, धनबली अफसरान-इंजीनियर-ठेकेदार, अदना पुलिस वाला, प्रापटी॓ डीलर, तमाम चेले-चपाटी, चापलूस, फरेबी बाबा या जाहिल खोजते हैं. मजबूरी में कभी रणनीतिकार, विचारक, धन-प्रबंधक, मीडिया मैनेजर या सम्मान देने के लिये किसी को खोजना होता है तो ऐसे लोगों को वे सिफ॓ सवण॓ समुदायों से ही चुनते हैं. थोड़ा भी संदेह हो तो लिस्ट उठाकर देख लें. जहां तक पढ़ने-लिखने वालों से निकटता बनाने में रूचि रखने वाले दलित-पिछड़े समुदाय के नेताओं का सवाल है, ऐसे नेताओं में जो कुछ प्रमुख नाम मुझे याद आ रहे हैं वे हैं: भूपेंद्र नारायण मंडल, अन्नादुराई, कपू॓री ठाकुर, चंद्रजीत यादव, देवराज अस॓, कांशीराम, वी एस अच्युतानंदन और शरद यादव भी औरों के मुकाबले बेहतर हैं. वे पढ़ने लिखने वालों से नजदीकी बनाये रखने की कोशिश करते हैं.’       

Monday, 20 June 2016

'एक सतत विद्रोही स्वर'.

वीरेंद्र यादव 
यह सचमुच त्रासद और अवसादकारी है कि जब फासीवाद की आहटें तेज हों और ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ सब कुछ लीलने और नष्ट करने की तैय्यारी में हो तब सत्ता प्रतिष्ठान से सीधी मुठभेड़ का दमखम रखने वाले सांस्कृतिक योद्धा मुद्राराक्षस विगत 13 जून को हमारे बीच नही रहे . यूं तो विगत डेढ़-दो वर्षों से बढ़ी उम्र और बिगड़ते स्वास्थ्य के चलते वे अपने घर तक सिमट जाने को विवश थे . लेकिन अपने आखिरी दौर में भी वे देश पर मंडराते सांस्कृतिक-राजनीतिक संकट से खासे बेचैन रहते थे . मुद्राराक्षस हिन्दी बौद्धिक समाज के सर्वाधिक विद्रोही व्यक्तित्व थे . वे महज एक लेखक न होकर एक ऐसे सक्रिय सार्वजनिक बुद्धिजीवी थे जो व्यापक सामाजिक मुद्दों और हाशिये के समाज के पक्ष में ‘एकला चलो रे’ का जोखिम उठाकर भी अपने प्रतिरोधी स्वर को बुलंद करते रहते थे . यह उन्ही का दमखम था कि ‘धर्मग्रंथों का पुनर्पाठ’ सरीखा क्रिटिक रचकर उन्होंने हिन्दुत्ववादी ताकतों को खुली बौद्धिक चुनौती दी थी .इन्ही दिनों भगत सिंह पर पुस्तक लिखकर उन्होंने भगत सिंह के होने और समसामयिक सन्दर्भों में उनकी जरूरत को शिद्दत से रेखांकित किया था . मुद्राराक्षस की वैचारिक निर्मिति में मार्क्सवाद, बौद्ध दर्शन, लोहियावाद और आम्बेडकर के चिंतन का गहरा प्रभाव था . लेकिन यह भी सच है कि वे किसी एक दार्शनिक राजनीतिक चिंतन के घेरे में कभी नही बंधे .अपने अंतिम उपन्यास ‘अर्धवृत्त’ में जहाँ उन्होंने ‘हिन्दू कसाईबाड़े’ शीर्षक अध्याय में हिंदुत्व की कपालक्रिया की है ,वहीं अगले ही अध्याय ‘दृष्टिबाधा’ में उन्होंने भारतीय वामपंथ को प्रश्नांकित करने में कोई कोर कसर नही छोडी है. वे अपने सवालों और प्रहार द्वारा जिस प्रतिपक्ष की संकल्पना करते थे वह सांचेढला न होकर विकल्प की नयी संभावनाएं से युक्त होता था 
लखनऊ के निकट के एक गाँव के अकुलीन परिवार में जन्मे (1933) मुद्राराक्षस दो दशकों के कलकत्ता और दिल्ली प्रवास के बाद जब आपातकाल के उत्पीडन के चलते आकाशवाणी की नौकरी से त्यागपत्र देकर अपने गृहनगर वापस हुए तो उनका व्यक्तित्वान्तरण हो चुका था . कुलीन समृद्ध समाज और सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा निगले जाने से बचकर अब वे अपने समाज के आंतरिक दृष्टा के रूप में ‘भगोड़ा’,,’हम सब मंसाराम’ और ‘शांतिभंग’ के रचनाकार थे . अति दलित मुसहर समुदाय पर उन्होंने अपना उपन्यास ‘दंड विधान’ तब लिखा था जब हिन्दी में दलित विमर्श की आमद भी न हुयी थी . यह सचमुच विडम्बनात्मक है कि साठ के दशक में पश्चिम के अराजक यौन दर्शन के प्रभाव में कलकत्ता में रहते हुए जब उन्होंने अपना उपन्यास ‘मैडेलिन’ लिखा था तब डॉ.नामवर सिंह ने उन्हें पत्र लिखकर सलाह दी थी कि वे ऐसे विकृत उपन्यास न लिखें .लेकिन बाद के दौर में जब उन्होंने हाशिये के समाज को अपनी रचनात्मकता का केंद्र बनाया तब डॉ.नामवर सिंह सहित आलोचना के समूचे कुलीनतंत्र ने उनके रचना कर्म की उपेक्षा ही की . मुद्राराक्षस स्वयं न तो राजीतिक सत्ता के मुखापेक्षी हुए और न ही सहित्यिक सत्ता के .अज्ञेय, दिनकर ,धर्मवीर भारती से लेकर डॉ.नामवर सिंह तक से उन्होंने सीधी मुठभेड़ की . एक दौर में वे शीर्ष कम्युनिस्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे और डॉ.राम मनोहर लोहिया के वे सीधे संपर्क में रहे .पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से लेकर विष्णुकांत शास्त्री तक कई राजनेताओं से उनकी निकट मैत्री रही लेकिन पद,प्रतिष्ठा और पुरस्कार से वे कोसों दूर रहे .कहा जा सकता है कि वे सतत सत्ता विरोधी थे .
मुद्राराक्षस हिन्दी के अकेले ऐसे लेखक थे जो जन्मना दलित न होते हुए भी दलित समाज और दलित लेखकों-बुद्धिजीवियों के बीच समान रूप से समादृत थे . आंबेडकरवादी संगठनों ने उन्हें ‘आंबेडकर रत्न’ व ‘शूद्राचार्य’ सरीखे सम्मान से भी सम्मानित किया था . दलित समाज द्वारा सिक्कों में तौलकर उनका जन-अभिनन्दन भी किया गया था . इस सब की पृष्ठभूमि में पत्र-पत्रिकाओं में विपुल संख्या में प्रकाशित होने वाले उनके वे लेख और स्तम्भ थे जो हिंदुत्व और पूंजीवादी सत्ता संरचना के साथ साथ जातिगत-वर्णाश्रमी अभिजन व्यवस्था पर भी उग्र तीखेपन के साथ आक्रामक तेवरों से लैस होते थे . बहुसंख्यकवाद का विरोध और उर्दू की पक्षधरता वे हिन्दू धर्म के नकार व हिन्दी को ब्राह्मणवादी भाषा करार देने की जिस सीमा तक जाकर करते थे उससे अल्पसंख्यकों का विश्वास और भरोसा भी उनको प्राप्त था . यूं तो मुद्राजी लोकसभा और विधानसभा का चुनाव भी लड़े थे लेकिन मात्र प्रतीकात्मक विरोध के लिए किसी राजनीतिक लोभ-लाभ के लिए नहीं. दरअसल कभी कभी अतियों के छोर पर मुद्राराक्षस का दिखना कुलीन-वर्णाश्रमी सांस्कृतिक-राजनीतिक सत्ता संरचना के विरुद्ध ध्यानाकर्षण की जरूरत होता था . .
मुद्राजी आजीवन संघर्षशील रहे ,स्वतंत्र लेखन ही उनकी आजीविका का साधन था . देश की राजधानी में बरसों गुजारने के बाद शायद ही किसी लेखक की वापसी उसके गृहनगर हुयी हो लेकिन मुद्राजी लौटे थे . .गृहनगर में भी उन्हें आधुनिक नया शहर छोड़कर उस पुराने इलाके की गंधाती संकरी गलियों के बीच पिता के मकान में शरणागत होना पड़ा था जहाँ भद्रजन का चार पहियों पर जाना दुष्कर था . इस कोटर में रहते हुए मुद्राजी ने जिस नैतिक आभा और स्वाभिमान के साथ फुरसतिया सुखासीन समाज को कबीर की तर्ज़ पर फटकार सुनायी वह ‘न भूतो न भविष्यत्’ है. वे सचमुच अलग,अकेले और अद्वितीय थे . .


जनता का डाक्टर: जिसने विभेद से भरे हुए समाज का इलाज भी जरुरी समझा

 सुनील यादव  डाक्टर शब्द का का नाम आते ही एक ऐसे प्रोफेसनल व्यक्ति का अक्स उभरता है जो खुद के लिए बना हो. चिकित्सा के क्षेत्र में चिकित्सक क...