Thursday, 4 August 2016

कैसा देश बना रहे हैं हम!



उर्मिलेश

हर साल अगस्त आते ही आजादी की याद आने लगती है। पर आजादी के सत्तरवें साल में प्रवेश करते हुए क्या हम यकीन के साथ कह सकते हैं कि आजाद होते देश ने नियति के साथ जो वादाकिया, वह सही दिशा में है! गरीबी हटाने, शोषण-उत्पीड़न खत्म करने, सबको शिक्षित व सेहतमंद बनाने और सेक्युलर-लोकतांत्रिक समाज गठित करने का सपना क्यों नहीं पूरा हुआ! औपनिवेशक दासता, राजशाही या गृहयुद्धों से मुक्त हुए कुछ देश हमसे भी बुरी हालत में हैं पर कई हमसे बहुत अच्छी स्थिति में हैं। इन देशों ने जिस तरह की आर्थिक प्रगति और मानव विकास सूचकांक, खासकर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उछाल हासिल किया, उसके आगे हम कहीं नहीं ठहरते। इसका सीधा मतलब है कि जन सरोकार के बड़े मुद्दे हमारे शासकों की प्राथमिकता नहीं बने। हमने अवाम के बदले अभिजन को केंद्र में रखा, ठोस मसलों के बजाय वोट-बटोरू मुद्दोंपर जोर दिया। यह सिर्फ किसी एक व्यक्ति, एक दल या एक सरकार की बात नहीं,य़ह हमारा राष्ट्रीय स्वभाव बन गया।
क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि आजकल ज्यादातर नेता जनता के बीच काम करके नहीं, टीवी पर्दे पर चीख-पुकार से बनते हैं! कुछ राष्ट्रवादी संगठनोंकी अपनी-अपनी निजी सेनाएंसक्रिय हैं, जो कभी गो-रक्षाके नाम पर तो कभी अंतरजातीय-अंतरधर्मीय प्रेम या विवाह रोकने के नाम पर लव-जिहाद विरोधीहथियारबंद अभियान चलाती हैं। ठोस एजेंडा और वैकल्पिक मॉडल-विहीन विपक्ष उसके निष्किय निन्दा-अभियान में जुटता है। ऐसे में सर्वजन हिताय’, ‘सामाजिक न्यायया सबका साथ-सबका विकासको जमीनी असलियत बनाना कैसे संभव है! लोकतंत्र को अंगीकार करने के बावजूद सामंती-औपनिवेशक दौर की हमारी संकीर्णताएं-कुंठाएं हमारे समाज में रची-बसी हैं। इन सबके साथ हम तरक्की का रास्ता तलाश रहे हैं। शिक्षा और जन-स्वास्थ्य का मौजूदा परिदृश्य हमारी भटकी प्राथमिकताओं का सबसे बड़ा उदाहरण है। दोनों क्षेत्रों के निजीकरण की तेज रफ्तार ने हमें आतंकवाद या उग्रवाद से भी ज्यादा क्षति पहुंचाई है। विश्वबैंक-आईएमएफ-अमेरिका की सिफारिश पर हम जीएसटी लागू कराने या तमाम सेक्टरों में सौ फीसदी एफडीआई के लिये बैचैन हैं। लेकिन जन-स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च बढ़ाने की विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिश हरगिज नहीं मानते! स्वास्थ्य का मुद्दा सिर्फ किसी व्यक्ति की जिन्दगी से जुड़ा नहीं है, वह उसके पूरे परिवार और इस तरह देश की आर्थिक तरक्की से भी जुड़ा है। गंभीर बीमारी के चलते किसी व्यक्ति का खाता-पीता मध्यवर्गीय या निम्न मध्यवर्गीय परिवार अचानक गरीबी रेखा के नीचे खिसक जाता है।
आईआईटी-एमबीए के संस्थानों और जेएनयू या टिसजैसे प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्रों के बावजूद प्राथमिक और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हम लगातार पिछड़ रहे हैं। आविष्कार-इनोवेशन क्षेत्र में हम कहां हैं? इन सवालों पर विचार करने के बजाय देश के कुछ गिने-चुने प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्रों को प्राचीन-शैली के गुरूकुलों जैसा बनाने की बात चल रही है! अंतरराष्ट्रीय मानक पर पहले से पिछड़े हमारे संस्थान फिर कहां ठहरेंगे? आखिर सुधारका यह कैसा राजनीतिक-अर्थशास्त्र है, जिसमें हमारी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार का इतना बुरा हाल हो रहा है? क्या ये तथ्य हमारी भटकी प्राथमिकताओं के ठोस सबूत नहीं हैं? जन-मुद्दों की यहां मैं लंबी-चौड़ी फेहरिश्त पेश नहीं करना चाहता। सिर्फ एक छोटा उदाहरण। क्या लोगों को यह बात नहीं मालूम कि बुलेट ट्रेनों से ज्यादा जरूरी हैं-समय से चलने वाली ज्यादा से ज्यादा रेलें, ज्यादा बर्थ, लाइनों का विस्तार, 12000 से ज्यादा जोखिम भरी रेलवे क्रांसिंग पर ओवरब्रिज, अंडरपास या आटोमेटिक रेलवेगेट। पर सरकार की प्राथमिकता कई लाख करोड़ रुपये की लागत वाली मुम्बई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन, दिल्ली-आगरा जैसे शहरों के बीच स्पीड ट्रेन, मोनो ट्रेन या अनेक बड़े-मझोले शहरों में मेट्रो चलाने पर है। मैं रेलवे के आधुनिकीकरण की सारी परियोजनाओं के खिलाफ नहीं हूं। लेकिन जिस देश में सिर्फ 60 हजार करोड़ खर्च करके असुरक्षित रेलवे-क्रांसिंग को सुरक्षित बनाया जा सकता है, वहां प्राथमिकता किसे मिलनी चाहिये? कुछ सौ करोड़ से हजारों की संख्या में रेल-बर्थ बढ़ सकते हैं। फिर लाख करोड़ वाली बुलेट ट्रेन क्या बाद में नहीं दौड़ सकती?
इन दिनों स्मार्ट सिटी की बात हो रही है, स्मार्ट विलेज की क्यों नहीं? बजट देखिये तो 100 करोड़। क्या 100 करोड़ से एक स्मार्ट सिटी बनता है? स्वच्छता अभियान की बात हो रही है पर सफाई में लगे लोगों का जीवन नारकीय बना हुआ है। आजादी के बाद भी सफाई की जिम्मेदारी समाज के खास निम्नवर्णीयहिस्से की ही क्यों है? प्रति वर्ष 100 से अधिक सफाईकर्मी गटर या मेनहोल में गिरकर या उससे निकलती गैसों के शिकार होते हैं। क्या दुनिया के किसी अन्य बड़े मुल्क में ऐसा होता है?  दुनिया के किस मुल्क में मरी गाय की चमड़ी निकालने वाले लोगों को कुछ लोग गौरक्षा के नाम पर पीटते या उनकी जान लेते हैं? बेरोजगार और निराश युवाओं के लिये एक और अभियान जारी है। सांप्रदायिकता, जातिवाद, टीवी चैनलों के झूठ-मक्कारी भरे रियल्टी शो और कथित मनोरंजन के फूहड़ कार्यक्रमों के मेल से युवाओं को खास तरह की आक्रामक भीड़में तब्दील किया जा रहा है।
इसमें शायद ही किसी को संदेह हो कि शासन लगातार कारपोरेट-हितों की तरफ झुकता गया है। इसके लिये अब वह खुले तौर पर दलील भी देता है कि गरीबी-बेरोजगारी जैसी समस्याओं का समाधान कारपोरेट के विस्तार-विकाससे हो सकेगा। सरकारों को किसी तरह के कारोबार में नहीं उतरना चाहिये, यह काम कारपोरेट का है। सवाल उठता है, इन कारपोरेट-घरानों में कितनों के पास अपने विकास के अलावा देश के सामाजिक-आर्थिक विकास का कोई मॉडल या सोच भी है? इस दौर में अमीर लोगों का एक समूह इस कदर अमीर बना कि इनमें कुछ दुनिया के शीर्ष अमीरों की सूची में स्थायी तौर पर दर्ज हैं। भारतीय गरीबी के दूर तक फैले रेगिस्तान में वे हरे-भरे नखलिस्तान जैसे लगते हैं। नेशनल सैंपल सर्वे संगठन(एनएसएसओ) के ताजा आंकड़े भी बताते हैं कि सुधारोंके दौर में अमीरी-गरीबी के बीच खाई तेजी से बढ़ रही है। इस बड़ी समस्या को संबोधित करने के बजाय हमारे शासकों का एजेंडा ही अलग है। वे देश के तेजी से फैलते विशाल मध्यवर्ग को देखकर मुग्ध हैं। आर्थिक सुधारों का सबसे अधिक फायदा अगर कारपोरेट के बाद किसी को मिला तो वह शहरी उच्च और मध्यवर्ग ही है। इसका बड़ा हिस्सा उच्चवर्णीय है। शासक-योजनाकारों को लगता है, यही वर्ग उनका असल संकटमोचक है। किसी तरह के गुणात्मक बदलाव की राजनीति या बड़े जन आंदोलन को भी यही मध्यवर्ग रोकेगा। इनके आर्थिक और योजना सलाहकार बता रहे हैं कि उच्च विकास-दर बनाए रखने के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश(एफडीआई) लाने जैसी पहल की जरूरत है। उच्च विकास दर का फायदा अंततः नीचे तक जाएगा(ट्रिकल डाउन थिउरी) और गरीबी अपने आप खत्म हो जाएगी। आखिर हम विश्वबैंक-आईएमएफ के इस टपकन(ट्रिकल डाउन) सिद्धांतमें क्यों यकीन कर रहे हैं, जब कि दुनिया के अनेक विकासशील देशों में इसकी पोल खुल चुकी है!
मुझे लगता है, समय गंवाए बगैर राजनीति और गवर्नेंस की कार्यदिशा में जरूरी बदलाव नहीं हुआ तो आगे का वक्त हमारे समाज के लिए तूफानी और खतरनाक साबित हो सकता है। दुखद है कि हमारे शासकों के पास बदलाव की कोई रणनीति नहीं है। डा. आंबेडकर ने बहुत पहले आगाह किया था, ‘26 जनवरी, 1950 को हम अंतविर्रोधों के जीवन में दाखिल होने जा रहे हैं। राजनीति के स्तर पर तो हमारे समाज में समानता होगी लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता होगी। राजनीति में एक व्यक्ति-एक वोट-एक हैसियतका सिद्धांत लागू रहेगा लेकिन सामाजिक-आर्थिक जीवन में एक व्यक्ति-एक वोट-एक हैसियतके सिद्धांत को नजरंदाज किया जाता रहेगा। हमें अपने समाज के इस अंतविर्रोध को जल्दी से जल्दी खत्म करना होगा। अगर ऐसा नहीं किया गया तो जो लोग असमानता के शिकार हैं, एक दिन वे लोकतंत्र की ऐसी संचरना को ध्वस्त करने में जुटेंगे।विडम्बना यह है कि हमारे योजनाकारों और नेताओं ने डा.आंबेडकर के इस महत्वपूर्ण आह्वान को भुला दिया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है, कैसा देश बना रहे हैं हम? किधर जा रहा है देश?
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31,जुलाई,16




Wednesday, 6 July 2016

‘राजनीति में जातिवाद’ सवर्णवादी कुंठा से निकला एक मुहावरा है



सुनील यादव

यह जातियों के राजनीतिकरण का ही परिणाम है कि किसी प्रदेश में होने वाले चुनाव से पहले वहाँ के जातीय समीकरण के अनुसार केंद्र में मंत्रीयों का चयन हो जाता है । रजनी कोठारी ने कहा था कि ''जिसे राजनीति में जातिवाद कहा जाता है वह मूलतः जातियों का राजनीतिकरण है ।'' सबसे ज्यादा 'जातिवादी राजनीति' का रोना रोने वाले लोग यह कभी नहीं चाहते थे कि जातियों का राजनीतिकरण हो ....क्योंकि जब जातियों का राजनीतिकरण नहीं हुआ था उस दौर में पिछड़े और दलितों के 300 घरों वाले गाँव में सिर्फ एक घर सवर्ण कितनी बार मुखिया बनता रहा .....यही स्थिति कमोवेश एमपी और एमएलए के चुनावों में भी रहती थी।....यह ध्यान रहे जातियों के राजनीतिकरण ने ही मुट्ठी भर वर्चस्वशाली जातियों के एकाधिकार को तोड़ा और इस लोकतन्त्र में आम जनता की सक्रिय भागीदारी हुई .......भारत में 90 प्रतिशत सवर्ण अपनी दोनों सवर्णवादी पार्टियों से जुड़े रहे/जुड़े हैं और तब तक राजनीति में जातिवाद नहीं था जब तक दलित पिछड़ो की राजनीतिक हिस्सेदारी नहीं थी।  पर जैसे ही दलित पिछड़ो में राजनीतिक समझदारी आयी उन्होने इस देश की लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में अपनी उपस्थिती दर्ज कराई वैसे ही एक नया मुहावारा वर्चस्वशाली समूहों ने उछाला 'जातिवादी राजनीति'॥ यह मुहावरा मीडिया में बैठे उन तमाम सवर्णों का है जिन्हे जातिवार जनगणना से जातिवाद बढ़ने का सातिराना खतरा नजर आता है। यह मुहावरा उन्ही सवर्ण मीडिया वालों का है जिन्हे 90 प्रतिशत सवर्ण वोट लेकर लोकसभा चुनाव जीतने वाली भाजपा जातिवादी पार्टी नजर नहीं आती।      
 दरअसल ...जातियों के राजनीतिकरण के बाद जो पिछड़ा और दलित नेतृत्व उभरा उसमें से अधिकांश की समझदारी मानसिक गुलामी वाली थी। कुछ को छोड़ दें तो अधिकांश ने जिस वैचारिक एजेंडे पर अपनी राजनीति शुरू की थी उसी का गला घोटते नजर आए। जैसा की वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश कहते हैं कि इन  दलित, पिछड़े नेतृत्व ने कभी अपने समाज के पढे लिखे लोगों को महत्व नहीं दिया। यह कोई मामूली बात नहीं है यह एक भयानक किस्म का  सच है जो अपने इतिहास को दोहरा रहा है। वह इतिहास जिसमें संत साहित्य के क्रांतिकारी सामाजिक विचारों और न्याय की लड़ाई को तुलसीदास जैसे ब्राह्मण कवियों ने पूरी तरह खत्म कर देने कि कोशिश की। आज यही हो रहा है सामाजिक न्याय की मसीहाई का दावा करने वाली अधिकांश पार्टियों ने अपने करीब एक सवर्ण अल्पजन की इस तरह की  जमात खड़ी कर ली है जो अपने सुझाओ से इन पार्टियों को खत्म करने पर तुले हुए हैं। ये सवर्ण अल्पजन ही इन पिछड़े दलित नेताओं को सबसे बड़े वैचारिक साझेदार हैं। उर्मिलेश जी इसी बात को इस ढंग से कहते हैं कि जब कभी पढ़े-लिखों से वे कभी किसी वजह से 'निकटता या सहजता' महसूस करते हैं तो वे सिफ॓ उच्चवणी॓य पृष्ठभूमि वाले होते हैं. पिछडो़-दलितों में वे सिफ॓ अपने लिये कुछ बाहुबली, धनबली अफसरान-इंजीनियर-ठेकेदार, अदना पुलिस वाला, प्रापटी॓ डीलर, तमाम चेले-चपाटी, चापलूस, फरेबी बाबा या जाहिल खोजते हैं. मजबूरी में कभी रणनीतिकार, विचारक, धन-प्रबंधक, मीडिया मैनेजर या सम्मान देने के लिये किसी को खोजना होता है तो ऐसे लोगों को वे सिफ॓ सवण॓ समुदायों से ही चुनते हैं. थोड़ा भी संदेह हो तो लिस्ट उठाकर देख लें. जहां तक पढ़ने-लिखने वालों से निकटता बनाने में रूचि रखने वाले दलित-पिछड़े समुदाय के नेताओं का सवाल है, ऐसे नेताओं में जो कुछ प्रमुख नाम मुझे याद आ रहे हैं वे हैं: भूपेंद्र नारायण मंडल, अन्नादुराई, कपू॓री ठाकुर, चंद्रजीत यादव, देवराज अस॓, कांशीराम, वी एस अच्युतानंदन और शरद यादव भी औरों के मुकाबले बेहतर हैं. वे पढ़ने लिखने वालों से नजदीकी बनाये रखने की कोशिश करते हैं.       

जनता का डाक्टर: जिसने विभेद से भरे हुए समाज का इलाज भी जरुरी समझा

 सुनील यादव  डाक्टर शब्द का का नाम आते ही एक ऐसे प्रोफेसनल व्यक्ति का अक्स उभरता है जो खुद के लिए बना हो. चिकित्सा के क्षेत्र में चिकित्सक क...